Puja Karte Samay Ki Jane Wali Galtiyan: क्या आपने कभी सोचा है कि रोज पूजा करने के बाद भी मन पूरी तरह शांत क्यों नहीं होता? क्या वजह है कि दीपक जलाने, फूल चढ़ाने और मंत्र पढ़ने के बाद भी जीवन में वही परेशानियाँ बनी रहती हैं? प्राचीन समय में काशी नगरी में एक धनवान व्यापारी रहता था। वह रोज बड़ी भक्ति से पूजा करता था।
घर में बड़ा मंदिर था, चांदी के बर्तन थे, कीमती फूल आते थे। फिर भी उसका मन अशांत रहता था। एक दिन एक संत उसके घर आए। उन्होंने देखा कि पूजा तो भव्य है, लेकिन व्यापारी पूजा जल्दी-जल्दी कर रहा है और मन व्यापार में लगा है।
संत ने कहा, पूजा दिखावे से नहीं, सही विधि और सच्चे मन से होती है। व्यापारी ने अपनी गलतियाँ सुधारीं। धीरे-धीरे उसके जीवन में शांति आने लगी। यहीं से हमें समझ आता है कि Puja Karte Samay Ki Jane Wali Galtiyan हमारी भक्ति को अधूरा बना सकती हैं।
बिना स्नान के पूजा करना
पूजा से पहले शरीर और मन की शुद्धता बहुत जरूरी है। कई लोग सुबह उठकर बिना नहाए सीधे पूजा करने बैठ जाते हैं। यह सही तरीका नहीं माना जाता। स्नान केवल शरीर साफ करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह मानसिक ताजगी भी देता है। जब शरीर स्वच्छ होता है, तो मन भी शांत रहता है।
अगर किसी कारण से पूरा स्नान संभव न हो, तो कम से कम हाथ-पैर और मुंह धोकर, साफ कपड़े पहनकर पूजा करें। रात के पहने हुए कपड़ों में या गंदे वस्त्रों में पूजा करना भी गलत माना जाता है। यह छोटी बात लग सकती है, लेकिन यही Puja Karte Samay Ki Jane Wali Galtiyan में से एक बड़ी गलती है।
इसके पीछे एक सरल कारण है। जब हम नींद से उठते हैं, तो शरीर में आलस और भारीपन होता है। सीधे पूजा में बैठने से ध्यान नहीं लगता। मन इधर-उधर भटकता रहता है। लेकिन जैसे ही हम स्नान करते हैं, पानी का स्पर्श शरीर की सुस्ती को दूर कर देता है। मन हल्का हो जाता है और सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती है।
हमारे बड़े-बुजुर्ग भी हमेशा कहते थे कि पूजा से पहले तन और मन दोनों की सफाई जरूरी है। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक अनुशासन है। जब हम साफ कपड़े पहनकर, ताजगी के साथ भगवान के सामने बैठते हैं, तो अंदर से भी सम्मान की भावना आती है। इसलिए कोशिश करें कि पूजा को कभी भी जल्दबाजी या लापरवाही में न करें। थोड़ी सी तैयारी आपकी पूजा को अधिक प्रभावशाली बना सकती है।
पूजा में जल्दबाजी करना
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग पूजा को भी एक काम की तरह जल्दी-जल्दी खत्म कर देते हैं। कई बार तो ऐसा होता है कि घड़ी देखते हुए पूजा की जाती है। मन में ऑफिस, घर के काम, बच्चों की जिम्मेदारी या मोबाइल की नोटिफिकेशन चलती रहती है। ऐसे में शरीर तो भगवान के सामने बैठा होता है, लेकिन मन कहीं और होता है।
पूजा कोई दिखावा नहीं है। यह भगवान से जुड़ने का समय है। अगर मन में जल्दी हो, तो ध्यान नहीं लगेगा। और जब ध्यान नहीं लगेगा, तो पूजा का असली आनंद और शांति भी महसूस नहीं होगी।
कम समय हो तो छोटी पूजा करें, लेकिन मन से करें। भगवान को समय नहीं, सच्चा भाव चाहिए। पांच मिनट भी पूरे मन से की गई पूजा, आधे घंटे की जल्दबाजी वाली पूजा से बेहतर होती है। कोशिश करें कि पूजा के समय खुद को थोड़ा शांत करें, गहरी सांस लें और फिर ध्यान लगाएं। जब आप धीरे-धीरे और शांति से पूजा करेंगे, तो मन में एक अलग सुकून महसूस होगा।
गलत दिशा में बैठना
वास्तु के अनुसार पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करना शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इन दिशाओं में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह ज्यादा होता है। जब हम सही दिशा में बैठकर पूजा करते हैं, तो मन को स्थिर करने में मदद मिलती है और ध्यान जल्दी लगता है।
गलत दिशा में बैठकर पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह कम हो सकता है। कई लोग बिना सोचे-समझे कहीं भी बैठ जाते हैं। हालांकि भगवान हर जगह हैं, लेकिन कुछ नियम ऐसे होते हैं जो पूजा को और प्रभावशाली बना देते हैं।
यदि संभव हो तो पूजा स्थान की दिशा का ध्यान रखें। अगर घर में पहले से मंदिर बना है और दिशा बदलना संभव नहीं है, तो कम से कम बैठने की दिशा सही करने की कोशिश करें। छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने से पूजा का असर और भी अच्छा हो सकता है। सही दिशा में बैठकर की गई पूजा मन को जल्दी शांत करती है और सकारात्मक सोच बढ़ाती है।
टूटी या खंडित मूर्ति रखना
घर के मंदिर में टूटी हुई मूर्ति रखना शुभ नहीं माना जाता। अगर मूर्ति में दरार आ जाए, तो उसे सम्मानपूर्वक जल में प्रवाहित करें। खंडित मूर्ति नकारात्मक ऊर्जा का कारण बन सकती है।
कई बार ऐसा होता है कि सफाई करते समय या किसी कारण से मूर्ति हल्की सी टूट जाती है। हम सोचते हैं कि छोटी सी दरार है, इससे क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान की मूर्ति पूर्ण और साफ होनी चाहिए। टूटी मूर्ति यह संकेत देती है कि अब उसे बदलने का समय आ गया है।
मूर्ति को कभी भी कूड़े में नहीं फेंकना चाहिए। यह बहुत बड़ी गलती मानी जाती है। उसे किसी पवित्र नदी, तालाब या बहते जल में प्रवाहित करना चाहिए, या फिर किसी मंदिर में दान कर देना चाहिए। नई मूर्ति लाने से पहले घर के मंदिर की अच्छी तरह सफाई करें। जब मूर्ति पूरी और सुंदर होती है, तो मन में भी सकारात्मक भाव आते हैं और पूजा में ध्यान ज्यादा लगता है।
बासी फूल और प्रसाद चढ़ाना
भगवान को ताजे फूल और ताजा प्रसाद अर्पित करना चाहिए। मुरझाए फूल या बासी प्रसाद चढ़ाना सही नहीं है। हर दिन पुराने फूल हटाना जरूरी है। कई लोग सुबह समय की कमी के कारण पिछले दिन के फूल ही भगवान के सामने छोड़ देते हैं।
लेकिन मुरझाए फूल ताजगी का प्रतीक नहीं होते। पूजा में शुद्धता और ताजगी बहुत जरूरी मानी जाती है। जब हम ताजे फूल चढ़ाते हैं, तो वह हमारी नई ऊर्जा और श्रद्धा का प्रतीक होते हैं।
इसी तरह प्रसाद भी हमेशा ताजा होना चाहिए। रात का बचा हुआ खाना या कई घंटे पुराना प्रसाद भगवान को अर्पित करना ठीक नहीं माना जाता। कोशिश करें कि जो भी प्रसाद बनाएं, वह साफ मन और स्वच्छ रसोई में तैयार किया गया हो।
मंदिर की सफाई न करना
मंदिर का स्थान साफ और व्यवस्थित होना चाहिए। धूल या गंदगी जमा होना अच्छा संकेत नहीं है। साफ वातावरण में पूजा करने से मन को शांति मिलती है। घर का मंदिर केवल एक कोना नहीं होता, वह घर की सबसे पवित्र जगह होती है। अगर वहीं धूल जमी हो, फूल सूखकर पड़े हों, दीपक का तेल बिखरा हो या कपड़ा गंदा हो, तो यह पूजा की पवित्रता को कम कर देता है।
कई लोग रोज पूजा तो करते हैं, लेकिन मंदिर की नियमित सफाई पर ध्यान नहीं देते। यही एक बड़ी गलती बन जाती है साफ मंदिर में बैठने से मन अपने आप शांत हो जाता है। जब आस-पास की जगह व्यवस्थित होती है, तो ध्यान भी भटकता नहीं है। हफ्ते में कम से कम एक बार मंदिर को अच्छे से साफ करना चाहिए। रोज पूजा के बाद पुराने फूल हटा देना और दीपक की जगह साफ कर देना जरूरी है। याद रखिए, जहां सफाई होती है, वहीं सकारात्मक ऊर्जा टिकती है।
मंत्रों का गलत उच्चारण
मंत्रों का सही उच्चारण महत्वपूर्ण है गलत उच्चारण से अर्थ बदल सकता है। अगर मंत्र याद नहीं हैं, तो सरल प्रार्थना करें। मंत्र केवल शब्द नहीं होते, वे ध्वनि और ऊर्जा का रूप होते हैं। हर मंत्र का अपना एक अर्थ और कंपन होता है। जब हम मंत्रों का गलत उच्चारण करते हैं, तो उसका अर्थ बदल सकता है या उसका प्रभाव कम हो सकता है।
कई बार लोग जल्दी-जल्दी मंत्र पढ़ते हैं, बिना समझे हुए। यह भी एक गलती है। अगर आपको मंत्र ठीक से नहीं आते, तो चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप धीरे-धीरे सीख सकते हैं। आजकल किताबों और ऑडियो के माध्यम से सही उच्चारण सीखा जा सकता है। लेकिन अगर फिर भी शक हो, तो सरल भाषा में भगवान से बात करना भी उतना ही प्रभावी है।
भगवान भावना समझते हैं। इसलिए मंत्र कम हों लेकिन सही और श्रद्धा से हों, यही सबसे जरूरी है। हर दिन पूजा के बाद पुराने फूल हटा दें और मंदिर को साफ कर दें। इससे घर का वातावरण भी अच्छा रहता है और मन में भी एक नई सकारात्मक शुरुआत का भाव आता है।
पूजा के समय मोबाइल का उपयोग
पूजा करते समय मोबाइल का उपयोग करना आज के समय की सबसे आम गलती बन चुका है। कई लोग भगवान के सामने बैठते तो हैं, लेकिन बीच-बीच में मैसेज चेक करते रहते हैं, कॉल उठाते हैं या सोशल मीडिया देख लेते हैं। ऐसा करने से पूजा का पूरा ध्यान भटक जाता है। पूजा का असली मतलब है मन को एक जगह स्थिर करना, लेकिन मोबाइल हमारी एकाग्रता तोड़ देता है।
जब हम किसी खास व्यक्ति से बात करते हैं तो पूरा ध्यान उसकी तरफ रखते हैं, उसी तरह जब हम भगवान के सामने बैठते हैं तो पूरा ध्यान उन्हीं पर होना चाहिए। अगर बार-बार मोबाइल की घंटी बजेगी तो मन बार-बार बाहर की दुनिया में चला जाएगा।
बेहतर यही है कि पूजा शुरू करने से पहले मोबाइल को साइलेंट या एयरप्लेन मोड पर रख दें। कुछ मिनट खुद को पूरी तरह भगवान को समर्पित करें। यही छोटी सी आदत आपकी पूजा को ज्यादा प्रभावशाली बना सकती है।
Read Also –Shanti Mantra Shanti Ke Liye Mantra Aur Arth
बिना श्रद्धा के पूजा करना
पूजा केवल एक रोज की आदत या घर की परंपरा नहीं है, यह दिल से जुड़ी हुई बात है। अगर पूजा सिर्फ इसलिए की जा रही है कि सब करते हैं इसलिए हम भी करें, तो उसका आधा असर ही रह जाता है। कई बार लोग केवल दिखावे के लिए या डर के कारण पूजा करते हैं। लेकिन भगवान को दिखावा नहीं चाहिए, उन्हें सच्चा मन चाहिए।
जब हम बिना श्रद्धा के पूजा करते हैं तो हमारे शब्द तो निकलते हैं, लेकिन भावना नहीं जुड़ती। ऐसे में पूजा केवल एक रस्म बनकर रह जाती है। सच्ची पूजा वही है जिसमें मन शांत हो, विश्वास हो और कृतज्ञता हो।
जरूरी नहीं कि घंटों तक पूजा करें। अगर पाँच मिनट भी सच्चे दिल से भगवान को याद किया जाए, तो उसका असर ज्यादा होता है। इसलिए पूजा करते समय मन में श्रद्धा, विश्वास और प्रेम होना बहुत जरूरी है।
नियमित समय का पालन न करना
पूजा में नियमितता बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। अगर हम कभी सुबह, कभी दोपहर और कभी रात को पूजा करते हैं, तो मन की एक आदत नहीं बन पाती। जैसे शरीर को रोज एक समय पर खाना मिले तो वह स्वस्थ रहता है, वैसे ही मन को भी एक तय समय पर प्रार्थना की आदत पड़नी चाहिए।
सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि उस समय वातावरण शांत और शुद्ध होता है। मन भी ताजा रहता है और ध्यान आसानी से लगता है। अगर सुबह संभव न हो तो शाम का एक निश्चित समय तय कर लें।
हर दिन एक ही समय पर पूजा करने से मन खुद उस समय तैयार होने लगता है। इससे एक सकारात्मक ऊर्जा बनती है और घर का वातावरण भी शांत रहता है। नियमितता छोटी बात लग सकती है, लेकिन यही आदत पूजा को मजबूत बनाती है।
Read Also- Subah Ki Puja Vidhi Sahi Tarika
दीपक को सही तरीके से न जलाना
दीपक ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है। शुद्ध घी या तेल का दीपक जलाना चाहिए। दीपक बुझने न दें। दीपक केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संकेत है। जब हम पूजा में दीपक जलाते हैं, तो उसका मतलब होता है कि हम अपने जीवन से अज्ञान और नकारात्मकता को दूर कर रहे हैं।
लेकिन कई लोग दीपक को बस औपचारिकता के लिए जला देते हैं। बाती सही से नहीं रखते, तेल कम डालते हैं या ध्यान नहीं देते कि दीपक बार-बार बुझ रहा है। दीपक जलाते समय यह ध्यान रखें कि बाती ठीक तरह से बनी हो और तेल या घी पर्याप्त मात्रा में हो।
कोशिश करें कि दीपक जमीन पर सीधे न रखें, उसे किसी दीपक स्टैंड या थाली में रखें। अगर पूजा के दौरान दीपक बुझ जाए, तो घबराएं नहीं, श्रद्धा से दोबारा जला लें। सही तरीके से जलाया गया दीपक पूजा का प्रभाव और सकारात्मक ऊर्जा दोनों बढ़ाता है।
आरती को नजरअंदाज करना
आरती पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आरती से वातावरण शुद्ध होता है। पूजा के अंत में आरती जरूर करें। बहुत से लोग पूजा तो कर लेते हैं, लेकिन अंत में आरती नहीं करते या बहुत जल्दी-जल्दी कर लेते हैं। यह भी एक आम गलती है। आरती का मतलब है भगवान के सामने अपनी भक्ति और कृतज्ञता को पूरी श्रद्धा से व्यक्त करना। जब आरती होती है, तो दीपक की रोशनी, घंटी की आवाज और भक्ति के शब्द मिलकर एक सकारात्मक माहौल बनाते हैं।
आरती करने से मन में उत्साह आता है और घर का वातावरण भी हल्का और शांत महसूस होता है। अगर संभव हो तो परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती करें। इससे घर में एकता और प्रेम भी बढ़ता है। आरती के समय मन को इधर-उधर न भटकने दें। धीरे-धीरे और भाव के साथ आरती गाएं। यही पूजा को पूर्ण बनाता है।
मन में नकारात्मक विचार रखना
अगर मन में गुस्सा या चिंता हो, तो पूजा का ध्यान भटक जाता है। पहले मन शांत करें, फिर पूजा करें। सकारात्मक सोच जरूरी है। कई बार हम पूजा तो कर लेते हैं, लेकिन मन में तनाव, गुस्सा या किसी के प्रति नाराज़गी होती है। ऐसे में शरीर तो पूजा कर रहा होता है, लेकिन मन कहीं और भटक रहा होता है। यही सबसे बड़ी गलती बन जाती है।
पूजा का असली उद्देश्य मन को शांत करना है। अगर मन में भारीपन है, तो पहले कुछ मिनट शांति से बैठें। गहरी सांस लें, भगवान का नाम लें और अपने मन की उलझनों को धीरे-धीरे छोड़ने की कोशिश करें।
याद रखिए, भगवान से कुछ भी छुपा नहीं है। आप उनसे अपने मन की बात खुलकर कह सकते हैं। जब मन हल्का होता है, तभी पूजा का असली आनंद मिलता है। सकारात्मक सोच और साफ दिल से की गई प्रार्थना हमेशा ज्यादा असरदार होती है।
पूजा को केवल मांगने का माध्यम समझना
- कई लोग सिर्फ परेशानी आने पर ही भगवान को याद करते हैं।
- जब काम अटक जाता है या कोई इच्छा पूरी नहीं होती, तब पूजा शुरू होती है।
- लेकिन पूजा का मतलब केवल मांगना नहीं होता।
- हमें रोज भगवान का धन्यवाद भी करना चाहिए।
- जो कुछ हमारे पास है, वह भी उनकी कृपा से ही है।
- आभार के साथ की गई पूजा मन को सच्ची शांति और संतोष देती है।
पूजा करते समय कौन-सी सबसे बड़ी गलती होती है?
सबसे बड़ी गलती है बिना श्रद्धा और ध्यान के पूजा करना। अगर मन कहीं और है और शरीर सिर्फ औपचारिकता निभा रहा है, तो पूजा का पूरा फल नहीं मिलता। जल्दबाजी, मोबाइल का इस्तेमाल और नियमों की अनदेखी भी बड़ी गलतियों में आती हैं। पूजा में मन, भावना और शांति सबसे जरूरी हैं।
क्या बिना स्नान किए पूजा करना गलत है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्नान करके पूजा करना शुभ माना जाता है। स्नान से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं। अगर किसी कारण से स्नान संभव न हो, तो कम से कम हाथ-पैर धोकर और साफ कपड़े पहनकर पूजा करनी चाहिए। स्वच्छता पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निष्कर्ष
Puja Ki Galti- Puja Karte Samay Ki Jane Wali Galtiyan हमें यह सिखाती हैं कि पूजा केवल एक रस्म नहीं है। यह आत्मा को शुद्ध करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने का माध्यम है। अगर हम छोटी-छोटी गलतियों को सुधार लें और सच्ची श्रद्धा से पूजा करें, तो जीवन में सुख-शांति अपने आप आने लगती है। याद रखिए, भगवान को भव्यता नहीं, सच्चा मन प्रिय है।